रेल की पटरी में जंग कैसे लगता है !

 रेलवे ट्रैक में उपयोग किया जाने वाला स्टील एक उच्च गुणवत्ता वाला स्टील मिश्र धातु है - जिसमें 0.7% कार्बन और 1% मैंगनीज होता है और इसे-C-Mn ’रेल स्टील के रूप में जाना जाता है ! जो जंग के लिए कम संवेदनशील है।



जब लोहे से बने सामान नमी वाली हवा में ऑक्सीजन से प्रतिक्रिया करते हैं तो लोहे पर एक भूरे रंग की परत यानी आयरन ऑक्साइड (Iron oxide) की जम जाती है. यह भूरे रंग की परत लोहे का ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया के कारण आयरन ऑक्साइड बनने से होता है, जिसे धातु का संक्षारण कहते या लोहे में जंग लगना कहते है !

अर्थात जब लोहा वायुमंडल (ऑक्सीजन) और नमी (पानी) के संपर्क में आता है तो लोहा इनके साथ क्रिया करके कुछ अवांछित यौगिक बना लेता है और लोहे का क्षय होने लगता है और इसी कारण इसका रंग भी बदल जाता है , इसे लोहे पर जंग लगना कहते है।

आपको जानकार आश्चर्य होगा कि विश्व के कुल उत्पादन का 15% लोहा जंग लगने के कारण ख़राब या नष्ट हो जाता है।

लोहे पर जंग लगना एक विद्युत रासायनिक क्रिया है।

लोहे पर जंग लगना एक प्रकार का संक्षारण है अर्थात लोहे पर जंग लगने को संक्षारण का एक उदाहरण कहा जा सकता है।

1. होली का महत्व

रेल में एक मोटा क्रॉस सेक्शन होता है ! सबसे संकीर्ण भाग पर लगभग 20 मिमी होता है ! इसलिए भले ही सतह पर जंग लगे, यह आगे जंग लगने से रोकता है, क्योंकि बाहरी सतह से स्टील कोरोड करता है। स्टील खुले में छोड़ दिया जाए तो जंग की दर लगभग 0.05 मिमी प्रति वर्ष होगी जिसका मतलब है कि जंग लगने के कारण 1 मिमी रेल स्टील में जंग लगने में 20 साल लगेंगे।

जंग के कारण एक रेल खंड का क्षरण नगण्य है, तेज गति से चल रहे रेल के पहियों के दबाव के कारण होने वाले क्षरण की अपेक्षा में बहुत ही कम है जिसका उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है ! रेल के शीर्ष को हमेशा चमकदार और पॉलिश रखा जाता है क्योंकि यह नियमित रूप से उपयोग किया जाता है।

 

रेलगाड़ियों का लगातार परिचालन होने वाले  रेलवे ट्रैक पर जंग लगने की प्रक्रिया बिना परिचालन या उपयोग ना होने वाले ट्रैक जंग की प्रक्रिया बहुत ही जल्द स्टार्ट होती है  !

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